पूजा बोस की अजीबो गरीब कला को सलाम गृहणी पूजा बोस बनी चित्रकार की महाशय पूजा बोस कला के बल पर बनाती है महापुरुषो के चित्र

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    *रिपोर्ट भीखाराम बोस शेरगढ[email protected]जोधपुर कहते हैं ना कला किसी की बपौती नही होती तो मोहताज भी नही होती।कोई भी कला सीखने के लिये कोई पैसा या विशेष प्रशिक्षण की जरुरत भी नही होती।बस मन मे ललक हो और सीखने की लालचा व कडी मेहनत से इंसान कुछ भी सीख सकता है।एेसी ही कला की एक सख्सियत पश्चिमी राजस्थान के रेगिस्तान इलाके के जोधपुर संभाग के जिला बाडमेर के गांव धीरा निवासी पूजा बोस ने बिना कोई प्रशिक्षण लिये ही जो कला सीखकर अपनी कला का हुनर दिखा कर प्रदर्शन कर रही है वो वास्तव मे जिले भर में अनोखा उदाहरण है,ये देखकर हर कोई स्तब्ध हैं।पूजा बोस साधारण परिवार मे पैदा होकर जो चित्रकारी की कला अपनी मेहनत व लगन से सीखी।आज उसे देश के महापुरुषो के चित्र उकेरकर प्रिन्टींग बनाकर हजारो देश वासियों का अपनी कला के बल पर दिल जीत लिया है ।हर कोई चर्चित कलाकार पूजा बोस की बनी प्रिन्टींग लेना चाहता है।पूजा बोस जो बाडमेर जिसे के देवडा गांव मे उकाराम बोस एक साधारण परिवार मे जन्म लिया इन्होने मिडील कलाश तक की शिक्षा गांव मे ही ग्रहण की फिर और परिवार की आर्थिक मजबूत नही होने के चलते ज्यादा पढ लिख नही सकी क्योंकि गांव मे इससे आगे पढने को स्कूल नही थी।उसके बाद पूजा गांव मे ही जब पशु चराने जाती थी तो वहा बैठी-बैठी मिट्टी पर चित्र बनाना सीखी और पिता के सहयोग से पेंटिंग कलर दिलाने पर कभी कभी घर मे मांडन व चित्र भी बनाती थी।किताबो व अखबारो के फोटो देखकर बनाने का प्रयास किया।पूजा के पिताजी उकाराम बोस किसान परिवार से है।पूजा का विवाह सत्र 2018 मे धीरा निवासी भगवत तंवर के साथ हुआ।पूजा के मन मे देख के महापुरुषो के प्रति बाल्यकाल से जो ललक थी जो अब भी बरकरार हैं।हुनर की ललक ने पूजा को देश के महापुरुषो के चित्र बनाने को हमेशा के लिए मजबूर कर दिया।उनके इस कला को सीखने शादी के बाद पति ने भी खूब सहयोग किया ।पूजा ने धीरे धीरे घर मे मांडणा यानि भित्ति चित्र बनाने शुरु किये और फिर कलर से कागज पर चित्रकारी करना शुरु किया।आज तक वो ज्योति बा फूले, भारत रत्न व संविधान निर्माता डॉ भीमराव अम्बेडकर, देश की प्रथम महिला शिक्षिका सावित्री बाई फूले, राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जैसे महापुरुषो के सैकड़ों चित्र बना चुकी।सरकार को एेसे कलाकारो को बढ़ावा देने के लिये कुछ विशेष योजनाएं बनाकर उनको लाभान्वित करना चाहिए जिससे इस प्रकार की हस्तकला को जीवित रखा जा सके।

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